आस्था माथुर
गुजरात के 2022 विधानसभा चुनाव के लगभग 2.5 वर्ष बाद राहुल गांधी ने हाल ही अहमदाबाद में गुजरात कांग्रेस नेतृत्व पर प्रश्न खड़े किए और कहा कि कुछ लोगों को अगर निकालना पड़े तो निकाल देना चाहिए। इसके बाद दिग्विजय सिंह ने भी कहा कि राहुल गांधी को कांग्रेस के अंदर मौजूद भाजपा समर्थकों को निष्कासित कर देना चाहिए। इन दो बयानों ने कांग्रेस में राष्ट्रीय संगठन की पकड़ और प्रदेश संगठनों की एकता की पोल खोल कर रख दी है। कांग्रेस राहुल गांधी के इस बयान को भाजपा से लड़ने के लिए एक निडर सोच बताकर उनका बचाव कर रही है लेकिन इस बयान से यह तो स्पष्ट हो गया है कि कांग्रेस संगठन में पड़ी दरारें अब खाई का रूप ले रही हैं। भारत की सबसे पुरानी राजनीतिक पार्टी लगातार केन्द्र में तीन बार करारी हार झेलने के बाद अब एक के बाद एक राज्यों में भी अपना आधार गंवा रही है। लेकिन कांग्रेसी नेता आत्मविश्लेषण करने के बजाय अपने पतन के लिए भाजपा को जिम्मेदार ठहरा रहे हैं।
हालांकि, गुजरात में कांग्रेस की कमजोर स्थिति कोई नया मुद्दा नहीं है, 2017 के अलावा यहां पार्टी की स्थिति काफी कमजोर ही रही है और चाहे वरिष्ठ कांग्रेस नेता अहमद पटेल के बेटी मुमताज पटेल का कांग्रेस को निशाना बनाना हो या हार्दिक पटेल का पार्टी छोड़ना हो, इस सबके बावजूद कांग्रेसी नेता अब तक कोई ठोस रणनीति बनाने में असफल रहे हैं। कर्नाटक में भी मुख्यमंत्री सिद्धारमैया और उपमुख्यमंत्री डीके शिवकुमार के बीच सत्ता संघर्ष तेज हो गया है। प्रदेश कांग्रेस के इस आंतरिक कलह को देखते हुए पार्टी अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे को हस्तक्षेप करना पड़ा। कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष ने दोनों नेताओं को एक साथ काम करने की हिदायत दी और चेतावनी दी कि उनका आपसी मतभेद पार्टी और राज्य के लिए नुकसानदेह साबित होगा।
गौरतलब यह है कि रणनीति बनाने की बजाय कांग्रेस संगठन अपने ही कार्यकर्ताओं पर संदेह जता रहा है। राजनीति और नेतृत्व की हर कसौटी पर ये संदेह कांग्रेस को गर्त में लेकर जाएगा, क्योंकि हर सांगठनिक इमारत की नींव कार्यकर्ता होता है। कांग्रेस कार्यकर्ता पहले से ही हताश हैं और ऊपर से उन पर शंका करना और प्रश्न खड़े करना कहीं न कहीं इन बड़े नेताओं के अति-आत्मविश्वास को तो दर्शाता ही है। बल्कि साथ ही कांग्रेस के अंदर की स्थिति को भी स्पष्ट करता है। कांग्रेस अपने ही घर में शांति बनाए रखने में असमर्थ है। जब एक राज्य में कांग्रेस को सरकार चलाने का अवसर मिला, तब भी पार्टी नेताओं का अहंकार और व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा राज्य के विकास से अधिक महत्वपूर्ण साबित हो रही है। यह दिखाता है कि कांग्रेस की राष्ट्रीय नेतृत्व में इतनी भी क्षमता नहीं है कि वह अपने ही नेताओं को अनुशासित रख सके।
तुलनात्मक रूप से देखा जाए तो पता चलता है कि जहां एक ओर कांग्रेस-शासित राज्यों में आंतरिक कलह और नेतृत्व संकट गहराता जा रहा है, वहीं भाजपा-शासित राज्य प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में विकास की राह पर आगे बढ़ रहे हैं। उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, गुजरात, महाराष्ट्र और असम जैसे राज्यों में मजबूत नेतृत्व और स्पष्ट नीति के चलते बड़े पैमाने पर विकास हो रहा है, दूसरी ओर कांग्रेस जहां सत्ता में वहां तो संगठन में संघर्ष नजर आ रहा है। लेकिन जहां कांग्रेस विपक्ष में है, वहां भी कांग्रेस के नेता एक दूसरे को पीछे खींचने में लगे रहते हैं। कर्नाटक में तो डीके शिवकुमार और सिद्धारमैया सत्ता के लिए लड़ते दिख रहे हैं, लेकिन राजस्थान में तो विपक्ष में रहते हुए प्रदेश अध्यक्ष गोविंद सिंह डोटासरा और नेता विपक्ष टीकाराम जूली एक होते नजर नहीं आ रहे हैं। हाल ही राजस्थान विधानसभा में इंदिरा गांधी को कांग्रेस की दादी बुलाए जाने पर हुए हंगामें में हुए समझौते ने इन दोनों नेताओं के बीच एक लकीर खिंच दी। इस सब कलह के बावजूद दिग्विजय सिंह कह रहे हैं कि “राहुल गांधी कांग्रेस के अंदर के भाजपा समर्थकों को कब बाहर निकालेंगे?”
राजनीति के गलियारों में यह आवाजें भी सुनी जा रही हैं कि यह प्रश्न कार्यकर्ताओं की निष्ठा पर उठे हैं या दिग्विजय सिंह के समकक्ष किसी बड़े नेता को घेरने की कोशिश की जा रही है। दिग्विजय सिंह पुराने कांग्रेसी नेताओं में से एक हैं और संगठन में मजबूत पकड़ रखते हैं। कहीं न कहीं ये नेता केसी वेणुगोपाल के समकक्ष है और वेणुगोपाल को तो संगठन में राहुल गांधी की आवाज माना जाता है। पिछले दिनों इन्हीं के समकक्ष नेता शशि थरूर भी प्रधानमंत्री मोदी की प्रशंसा के चलते खबरों में रहे, केरल कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष ने उनकी आलोचना की और राहुल गांधी ने थरूर को समन किया। राशिद अल्वी ने पहले ही कह दिया था कि कांग्रेस में जमीन से जुड़े नेताओं की कद्र नहीं होती, उन्हें दरकिनार किया जाता है। इन सभी बिंदुओं को जोड़ने पर यह भी प्रश्न उठता है कि भाजपा समर्थकों को बाहर निकालने के नाम पर दिग्विजय सिंह द्वारा बुने जा रहे इस जाल का शिकार संगठन का कोई बड़ा नेता तो नहीं?
राहुल गांधी और उनके समर्थकों को यह समझना होगा कि कांग्रेस की विफलता का कारण भाजपा नहीं, बल्कि उनका स्वयं कांग्रेस पार्टी का शीर्ष नेतृत्व है। भाजपा के खिलाफ झूठे आरोप लगाने के बजाय कांग्रेस को अपनी रणनीतियों पर पुनर्विचार करना चाहिए। कांग्रेस का काम अब जनता को गुमराह करने से नहीं चलेगा। कांग्रेस ने वर्षों तक जाति और तुष्टीकरण की राजनीति के सहारे शासन किया, लेकिन अब जनता इस खेल को समझ चुकी है। भाजपा के नेतृत्व में देश प्रगति कर रहा है और लोग अब उसी नेतृत्व को आगे बढ़ता हुआ देखना चाहते हैं। आज का भारत एक कुशल और सशक्त नेतृत्व चाहता है, दिशाहीनता नहीं। यही कारण है कि जनता ने कांग्रेस को नकार कर, मोदी सरकार के साथ देश को आगे बढ़ाने का संकल्प लिया है। क्योंकि कांग्रेस देश को ‘मिसलीड’ करने में व्यस्त है, जबकि भाजपा देश को ‘लीड’ कर रही है।
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