अभिमत

हमारी प्राचीन सभ्यता और आधुनिक विश्व के बीच अमिट पुल बनी अमूर्त विरासतें भी अब वैश्विक पटल पर चमक रही हैं। दीपावली का यूनेस्को की अमूर्त सांस्कृतिक धरोहर सूची में शामिल होना हर भारतीय के लिए गर्व का क्षण है।

यह पर्व अंधकार पर प्रकाश की विजय का प्रतीक है, जो सनातन संस्कृति की आत्मा में बसा समृद्धि, समता और सामाजिक एकता का संदेश देता है। गरीब से लेकर अमीर तक ​का घर दीपों से जगमगाता है। हर वर्ग तक खुशहाली पहुंचने की कामना की जाती है।

गौरतलब है कि अक्टूबर में सरयू तट पर 26.17 लाख दीये जलाकर गिनीज बुक आफ विश्व रिकॉर्ड रचा गया था। संभव है कि इस आयोजन ने यूनेस्को को प्रभावित किया हो।

भारत की 15 अमूर्त धरोहरें—कुंभ मेला, रामलीला, वैदिक मंत्रोच्चार, छऊ नृत्य, दुर्गा पूजा—इस सूची में पहले ही शुमार हैं। दिल्ली में आयोजित यूनेस्को की 20वीं इंटर-गवर्नमेंटल कमेटी बैठक ने इस फैसले को मंजूरी दी। 10 दिसंबर को देशभर में विशेष दीपावली समारोह आयोजित हुए, जिसने सबका ध्यान खींचा।

दरअसल, यूनेस्को इस सूची में ऐसी सांस्कृतिक व पारंपरिक चीजों को शामिल करता है जो अमूर्त होती हैं, मगर समाज में उसकी व्यापक मान्यता होती है। दुनिया की महत्वपूर्ण सांस्कृति धरोहरों को सुरक्षित रखना इसका उद्देश्य है। वैश्वीकरण के दौर में सांस्कृतिक विविधता की रक्षा भी बड़ा काम है।

दीपावली प्रकृति चक्र से जुड़ी है।शरद ऋतु में उजाले का उत्सव है, जो ज्ञान और धर्म से भी जुड़ा है। निश्चित रूप से दीपावली अब समूची दुनिया को अंधकार से प्रकाश की ओर बढ़ने का संदेश देगी।

दीपावली के जश्न में आध्यात्मिक गहराई भी है। यह त्योहार भगवान राम, बुराई पर अच्छाई की विजय की याद तो दिलाता ही है, सामाजिक समरसता भी सिखाता है। दिल्ली और अन्य शहरों में द्वितीय दीपोत्सव इसका प्रमाण है।

अब हमारी जिम्मेदारी है कि इसे पर्यावरण-अनुकूल बनाने पर ध्यान दें, ताकि यह त्योहार किसी के लिए मुसीबत न बने। यह विरासत शाश्वत मानवीय मूल्यों और अच्छाई की जीत का प्रतीक है। विश्वास है, दुनिया इसका संदेश अंगीकार करेगी।

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