अभिमत
राष्ट्रभक्ति के प्रतीक राष्ट्र गीत वंदे मातरम् के सृजन के डेढ़ सौ वर्ष पूरे होने पर देश भर में उत्साह है। बंकिम चंद्र चटर्जी की इस अमर रचना ने स्वतंत्रता संग्राम के दौरान भारतीयों की रगों में जोश भर दिया था। क्रांतिकारियों ने इसी गीत से प्रेरणा ग्रहण कर अपना सर्वस्व न्यौछावर किया। आजादी की लड़ाई में इसकी गूंज हर कोने में सुनाई दी। इस पावन अवसर पर देशभर में सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित हो रहे हैं, जो स्वतंत्रता सेनानियों के बलिदान को स्मरण कराने का माध्यम बने हैं।
निस्संदेह, बंकिम चंद्र चटर्जी की इस रचना ने बंगाल में क्रांतिकारियों को गहरे तक प्रेरित किया और स्वतंत्रता संग्राम को गति देने में ऐतिहासिक भूमिका निभाई। बंगाल विभाजन के दौर में यह बंगाली अस्मिता का प्रतीक बना। इसकी सर्वस्वीकार्यता ही इसका सबसे बड़ा प्रमाण है।
लोकसभा में इस गीत पर चर्चा के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा कि इस गीत के 50 वर्ष पूरे होने पर देश गुलामी की जंजीरों में था, जबकि 100 वर्ष पर आपातकाल का साया था। इसलिए उत्सव उतना भव्य न हो सका। हालांकि, विपक्ष इस आयोजन के राजनीतिक निहितार्थों पर सवाल उठा रहा है। विपक्ष कह रहा है कि जब पश्चिम बंगाल में कुछ समय बाद विधानसभा चुनाव होने वाले हैं तो इस गीत का राजनीतिकरण क्यों किया जा रहा है। पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस सत्ता में है। आरोप है कि सांस्कृतिक प्रतीकों को चुनावी हथियार बनाया जा रहा है। संसद में प्रधानमंत्री के कुछ उल्लेखों पर कांग्रेस ने आपत्ति जताई, इसे वैचारिक विभाजन फैलाने का प्रयास बताया।
विडंबना है कि ओजपूर्ण गीत का विमर्श चिंतन से भटक गया। विपक्ष का कहना है कि साझा विरासत को राजनीतिक अखाड़े में घसीटा जा रहा है। सांस्कृतिक गौरव जरूरी है, लेकिन सुशासन का कोई विकल्प नहीं। यह अवसर राष्ट्र को एकजुट करने का है, न कि ध्रुवीकरण का। इतिहास का उपयोग जनता को एकजुट करने के लिए किया जाना चाहिए। वंदे मातरम् बहुलता वाले राष्ट्रवाद का प्रतीक बने, न कि विवाद का कारण।
