अभिमत

करीब ढाई अरब वर्ष पुरानी अरावली पर्वतमाला, जो हिमालय से भी प्राचीन है, आज अस्तित्व के संकट से जूझ रही है। उच्चतम न्यायालय ने ​केंद्र सरकार की समिति के शपथपत्र के आधार पर अरावली की परिभाषा स्वीकार कर ली है। यानी अब 100 मीटर या उससे ऊंची पहाड़ियों को ही अरावली माना जाएगा। पर्यावरणविदों का मानना है कि इससे 92 प्रतिशत पहाड़ियां संरक्षण से बाहर हो गई हैं। केंद्र सरकार का दावा है कि इससे अरावली की सुरक्षा होगी, लेकिन पर्यावरणविद इसे अरावली का डेथ वारंट मान रहे हैं। इससे जनता में रोष है। सेव अरावली’ अभियान शुरू हो चुका है। लोग सड़कों पर उतर आए हैं। लोगों का लग रहा है अब विकास के नाम पर अरावली पर्वतमाला नष्ट कर दी जाएगी।

केंद्र-राजस्थान सरकार के स्पष्टीकरण ​के बावजूद लोगों में रोष बना हुआ है। सोशल मीडिया पर ‘सेव अरावली’ ट्रेंड कर रहा है। राजस्थान, हरियाणा, दिल्ली में धरने-प्रदर्शन तेज हुए हैं। पूर्व सीएम अशोक गहलोत ने डीपी बदली, तो कांग्रेस के प्रदेशाध्यक्ष गोविंद डोटासरा, विधानसभा में प्रतिपक्षा के नेता टीकाराम जूली, पूर्व प्रदेशाध्यक्ष सचिन पायलट ने भी मोर्चा खोल दिया है। भारतीय आदिवासी पार्टी के सांसद राजकुमार रोत, निर्दलीय विधायक रविंद्र सिंह भाटी, आरएलपी के सांसद हनुमान बेनिवाल भी इस ​परिभाषा का मुखर विरोध कर रहे हैं। अब यह पर्यावरण से आगे धार्मिक-सांस्कृतिक मुद्दा बन गया है।

सुप्रीम कोर्ट ने 20 नवंबर को कहा था कि जब तक केंद्र की निगरानी में सस्टेनेबल माइनिंग प्लान न बने, तब तक नया खनन पट्टा जारी नहीं किया जाए, लेकिन अरावली की सीमा तय करने में 100 मीटर ऊंचाई का फॉर्मूला अपनाया। राजस्थान सरकार का यही 100 मीटर वाला पुराना फॉर्मूला कोर्ट ने 2010 में खारिज कर दिया था, लेकिन इस बार कोर्ट ने इसे मान लिया। सवाल यह है कि जो फार्मू्ला कोर्ट ने खारिज कर दिया था, उसे सरकार ने कोर्ट के सामने फिर क्यों रखा। इसका नतीजा यह निकला है कि खनन लॉबी को राहत मिल गई है और पर्यावरण को झटका लगा है।

1990 के दशक से निर्माण बूम ने अरावली को बहुत नुकसान पहुंचाया। अवैध खनन की भी अनदेखी की गई। इससे भूजल में कमी आई, वनों की कटाई हुई और वायु प्रदूषण में बढ़ोतरी के कारण लोगों की समस्या बढ़ी । अब ‘अरावली ग्रीन वॉल’ प्रोजेक्ट की बात हो रही है, लेकिन इस बात का ध्यान रखना होगा कि पुनर्वनीकरण वनों के नुकसान की भरपाई नहीं कर सकता।
राजस्व की लालच समस्या की जड़ है। निगरानी तंत्र भी प्रभावी नहीं है। इससे खनन अरावली के लिए संकट का कारण बना हुआ है। नई परिभाषा से तो अरावली का ​अस्तित्व ही संकट में पड़ सकता है।

अरावली पर्वतमाला सिर्फ पहाड़ नहीं है। यह दिल्ली का फेफड़ा और जैव विविधता का घर है। अरावली रेगिस्तान का प्रसार रोकती है और भूमि के भीतर जल पहुंचाती रहती है। कथित विकास के नाम पर 100 मीटर की परिभाषा तो तय कर दी गई, लेकिन पर्यावरण के पक्ष को नजरअंदाज कर दिया गया। जनता की चिंता जायज है। सरकार को ठोस कदम उठाने होंगे, वरना आंदोलन बेकाबू हो सकता है। हर हाल में अरावली को बचाया जाना चाहिए।

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