अमिमत

जहरीली हवा से दिल्ली के लोगों की चिंता बढ़ रही है। इंडिया गेट के पास हाल में जुटी भीड़ इसी बेचैनी की अभिव्यक्ति थी। राजधानी दिल्ली का एक्यूआई 400 के आसपास पहुंच कर ‘गंभीर’ श्रेणी में आ चुका है।दिल्ली की हवा पर चर्चा अक्सर महज राजधानी की समस्या के रूप में सीमित कर दी जाती है, जबकि आंकड़े बताते हैं कि इसकी जद में पूरा देश आता जा रहा है। उद्योग, बिजलीघर, ट्रांसपोर्ट और कृषि की वजह से निकलने वाला धुआं फेफड़ों के लिए खतरनाक बन जाता है। इसी पृष्ठभूमि में इंडिया गेट पर नजर आया जनविरोध साझा त्रासदी की ओर इशारा करता है। अब तक मध्यम वर्ग की प्रतिक्रिया घरों में एयर प्यूरीफायर लगाकर, खिड़कियां बंद करके या कुछ समय के लिए दिल्ली से बाहर चले जाने तक सीमित थी, पर लगातार बिगड़ते हालात ने उसे भी सार्वजनिक तौर पर सवाल पूछने पर मजबूर कर दिया है। उसने चुप्पी तोड़ी है, जिस पर सरकार को गंभीरता से ध्यान देना चाहिए।

दुर्भाग्य से शासन की प्रतिक्रिया संवाद की नहीं दमन की रही। इससे ऐसा लगा कि प्रदर्शनकारी नागरिकों को वह खतरा मानती है। रैपिड एक्शन फोर्स की तैनाती यह संदेश देती है कि सत्ता पर्यावरणीय असंतोष को नीतिगत चुनौती नहीं, ‘लॉ एंड ऑर्डर’ की समस्या मानती है। यह वही मानसिकता है जिसमें प्रदूषण को महज कुछ हफ्तों का मौसमी आपातकाल मान लिया जाता है और फिर हर साल पानी के टैंकर, एंटी-स्मॉग गन, स्कूल बंद, ठेकेदारों पर थोड़े जुर्माने जैसे फौरी कदम उठाए जाते हैं और उसके बाद सब सामान्य।

शोध साफ संकेत दे रहे हैं कि प्रदूषण का असुरक्षित स्तर अब देश के बड़े हिस्से की स्थायी नियति बन चुका है। मौजूदा नियम, मॉनिटरिंग नेटवर्क और क्रियान्वयन तंत्र अलग-अलग राज्यों और क्षेत्रों में या तो कमजोर हैं या बिखरे हुए हैं। हालात सुधारने के लिए वायु गुणवत्ता प्रबंधन आयोग जैसे संस्थान जरूर बनाए गए, लेकिन नीति और अमल के बीच के अंतर है के कारण इसका खास लाभ नहीं हुआ।

हवा न तो राज्य की सीमाएं मानती है, न मंत्रालयों की फाइलें। इसके बावजूद इससे जुड़े काम कई केंद्रीय मंत्रालयों, राज्य विभागों, नगर निकायों और अलग-अलग नियामकों में बंटे हैं। इनमें से हर एक के पास अधूरे अधिकार हैं और वे आपस में ही उलझते दिखाई देते हैं। अगर आयोग वास्तव में प्रभावी बनाना है तो उसका पहला काम होना चाहिए कि वह केंद्र और राज्यों से स्पष्ट, समयबद्ध और क्षेत्रवार उत्सर्जन घटाने की योजनाएं लिखित रूप में मांगे, उनके क्रियान्वयन की लगातार निगरानी करे और सारे आंकड़े सार्वजनिक प्लेटफॉर्म पर डाले।

सबसे जरूरी बात है कि सरकारों को जुगाड़ू और अस्थाई तकनीकी उपायों के प्रति आकर्षण छोड़ना होगा। कुछ पानी के टैंकर, कुछ एंटी-स्मॉग गन या कुछ दिनों की ‘रेड अलर्ट’ मुहिमें दिखने में सक्रियता का आभास तो देती हैं, लेकिन इससे समस्या का समाधान नहीं होता। असली काम पांच बड़े क्षेत्रों पर करने होंगे। ये हैं बिजली, उद्योग, परिवहन, निर्माण और कृषि। इन क्षेत्रों के लिए सख्त मानक बनाने होंगे। इसके बाद उनके क्रियान्वयन में कड़ाई बरतनी होगी। प्रदूषणकारी इकाइयों को चरणबद्ध तरीके से बंद करना होगा। साथ ही स्वच्छ ईंधन—तकनीक के लिए वित्तीय प्रोत्साहन और पारली की तरह के फसल अवशेष जलाने के व्यावहारिक विकल्प जैसे बुनियादी कदम उठाने होंगे। यह सफर लंबा और राजनीतिक रूप से कठिन जरूर लगता है, लेकिन स्थायी सुधार का कोई दूसरा रास्ता दिखाई नहीं देता।

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