अभिमत
आज के डिजिटल युग में साइबर अरेस्ट एक गंभीर समस्या बन चुका है। यह विशेष रूप से धोखाधड़ी वाले वीडियो कॉल और झूठे आरोपों के माध्यम से लोगों को फंसाने की विधि है, जिसमें अपराधी पुलिस या सरकारी अधिकारियों का दिखावा कर पीड़ितों को डराते हैं और उनसे पैसों की मांग करते हैं। यह अपराध केवल एक राज्य या क्षेत्र तक सीमित नहीं है, बल्कि समूचे देश एवं अंतरराष्ट्रीय स्तर तक फैल चुका है है।
भारत में सुप्रीम कोर्ट ने इस गंभीर समस्या को स्वीकार करते हुए केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) को पूरे देश में डिजिटल अरेस्ट के मामलों की जांच करने का निर्देश दिया है। इस निर्देश की महत्ता इसलिए भी है क्योंकि सामान्यतः राज्य सरकारों की सहमति के बिना ऐसे निर्देश कठिन होते हैं।
अदालत ने न केवल घोटालेबाजों को निशाना बनाने को कहा है बल्कि उन बैंकिंग अधिकारियों को भी पर भी शिकंजा कसने की बात कही है, जो अपराधियों को अवैध धन के स्थानांतरण की सुविधा प्रदान करते हैं। यह एक विशाल वित्तीय नेटवर्क है, जिसके कारण आरबीआई जैसी संस्थाओं का हस्तक्षेप अत्यंत आवश्यक है। अदालत ने मशीन लर्निंग और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का भी उपयोग करने का मार्गदर्शन दिया है ताकि इन खातों के माध्यम से होने वाली अवैध लेनदेन की पहचान की जा सके।
देश में साइबर धोखाधड़ी की घटनाओं की संख्या तेजी से बढ़ी है, बाहर के देशों में विशेष रूप से संघर्षग्रस्त क्षेत्रों में “घोटाला केन्द्रों” का प्रसार हो रहा है, जहां युवाओं को ऑनलाइन धोखाधड़ी का हिस्सा बनने के लिए मजबूर किया जाता है। इस आपराधिक चुनौती का समाधान केवल देशीय स्तर पर संभव नहीं, बल्कि इसके लिए ठोस अंतरराष्ट्रीय सहयोग व कूटनीति की आवश्यकता है।
घरेलू स्तर पर इस लड़ाई में सबसे बड़ा हथियार डिजिटल साक्षरता और जागरूकता है। हमारी जिंदगी और शासन-प्रशासन का डिजिटलकरण बहुत तेजी से बढ़ रहा है, लेकिन लोगों में साइबर जागरूकता नहीं है। राज्यों और स्थानीय प्रशासन के साथ मिलकर भारतीय रिजर्व बैंक को व्यापक स्तर पर जागरूकता अभियान और शिक्षा कार्यक्रम चलाने चाहिए। इसके साथ ही राज्य पुलिस को डिजिटल उपकरणों और कौशल से लैस करना बहुत जरूरी है ताकि समय पर और प्रभावी जांच संभव हो सके।
जाहिर है डिजिटल अरेस्ट महज एक साइबर अपराध नहीं बल्कि एक राष्ट्रीय और वैश्विक सुरक्षा चुनौती है। इसे रोकने के लिए अदालत, सरकार, वित्तीय संस्थान और अंतरराष्ट्रीय समुदाय को मिलकर काम करना होगा। सिर्फ तकनीकी साधन ही नहीं, बल्कि सामाजिक जागरूकता और सख्त नीतियां भी इस अपराध की जड़ पर वार करने में मदद करेंगी।
