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डाॅ. जितेन्द्र लोढ़ा, स्वतंत्र लेखक व शिक्षाशास्त्री

दिलों के बहुत करीब, क्षण भर भी ओझल रहने पर हम सब को बैचेन कर देने वाली, हमारी अपनी सार्व-लाडली आभासी दुनियाँ का भी अपना एक नवोदित व प्रचलित मनोविज्ञान है। जिसके मुख्य चर लाइक, कमेंट, फ्रेंड रिक्वेस्ट आदि के दृष्टिपक्ष को यदि हम गौर से देखेंगे तो हमें इसमें पक्ष, विपक्ष, अहम, वहम, जैसे अनेक मनोवैज्ञानिक दृष्टिकोण स्पष्ट दिखाई देंगे। इससे गहन जुड़ाव रखने पर अपना, पराया, ऊँच, नीच, दिखावा, सत्य, असत्य, प्रदर्शन, प्रयोग, प्रचार, कुप्रचार, समर्थन, निंदा, भाव, ताव, कौतुहल, अजब, गजब, आश्चर्य, आशा एवं निराशा जैसे अनेकानेक पक्षों के विज्ञान की समझ हमको स्वयंमेव व सहज स्वरूप में मिल जाती है। इसके उदय होने से समाज में फुसफुसाट, दब्बूपन, चुगली, गुगली कम हुई है। मन की सफाई (भड़ास) हाथ की हाथ… सब कुछ ताजा… कुछ बासी नहीं… क्षण में हिट, फिट और आऊट। अंत में लेकिन अंतिम नहीं, कहन यह है कि- जब यह दुनियाँ मनभावन व मनमोहक होने के साथ-साथ मालिक भी बन गयी है, तो इसके फायदे, कायदे व नुकसान के मनोविज्ञान का जानकार होना, हमारे लिए बेहद ज़रूरी है।

तकनीक ने आज हमारे जीवन को जितना आसान बनाया है, उतना ही जटिल भी बनाया है। इंटरनेट, सोशल मीडिया और कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) ने अब एक नई आभासी दुनिया रच दी है, जहाँ सब कुछ चमकदार है, मगर सब कुछ वास्तविक भी नहीं। यह दुनिया हमारे विचार, व्यवहार और भावनाओं को इस कदर प्रभावित कर रही है कि अब मनोविज्ञान को भी डिजिटल युग की भाषा में पुनर्परिभाषित करना पड़ रहा है। आभासी दुनिया में व्यक्ति अपनी एक डिजिटल पहचान बनाता है। यह पहचान अक़्सर उसकी वास्तविकता से अलग होती है- थोड़ी सुंदर, थोड़ी सजी-धजी, और कभी-कभी बिल्कुल काल्पनिक। यह वर्चुअल आइडेंटिटी आत्मविश्वास का आभास तो देती है, पर धीरे-धीरे व्यक्ति को आत्मसंवाद से भी दूर कर देती है। जब वास्तविक और आभासी मैं (आई) में दूरी बढ़ती है, तब मनोवैज्ञानिक असंतुलन शुरू होता है। चिंता, अवसाद, अकेलापन और आत्ममूल्य के संकट इसी के परिणाम हैं। मनोवैज्ञानिक बताते हैं कि सोशल मीडिया का आकर्षण मस्तिष्क के डोपामिन तंत्र से जुड़ा है। हर लाइक, कॉमेंट या फॉलो एक क्षणिक सुख देता है, जैसे कोई डिजिटल इनाम। यह त्वरित आनंद धीरे-धीरे लत का रूप ले लेता है। यही कारण है कि आज के युवा वर्ग में ऑनलाइन निर्भरता, सूचनाओं की थकान और डिजिटल आक्रोश जैसी स्थितियाँ लगातार बढ़ रही हैं।

इस तस्वीर का दूसरा पहलू भी है। आभासी दुनिया ने इंसान को संवाद के नये और विशेष आयाम दिए हैं। अब इंसान भौगोलिक सीमाओं से परे जाकर अपनी पहचान, विचार और अस्तित्व को वैश्विक मंच पर रख सकता है। यही आभासी दुनिया संवाद, शिक्षा, चिकित्सा, समाज-सेवा, जागरूकता और नवाचार का मंच भी बनी है। महामारी के समय यही दुनिया जीवन और सीखने का सहारा बनी। यानी समस्या तकनीक में नहीं, उसके उपयोग के तरीकों में हैं। इस लिहाज से आज सबसे बड़ी चुनौती है- डिजिटल अनुशासन की। हमें यह तय करना होगा कि तकनीक हमारे लिए साधन बने, न कि स्वामी। स्क्रीन के बाहर भी एक जीवन है, वह जीवन जो असली मुस्कानों, सच्चे संबंधों और अनुभवों से भरा है। आभासी दुनिया का मनोविज्ञान हमें यही सिखाता है कि वर्चुअल रिश्ते सुविधा देते हैं, पर संवेदना हमेशा आमने-सामने की आँखों में जन्म लेती है। इसलिए अब ज़रूरी हो गया है कि हम तकनीक को अपनाएँ, पर उस पर आश्रित न हों, अर्थात डिजिटल युग की चमक के बीच मानवता की रोशनी को बचाए रखना ही इस युग की सबसे बड़ी मानसिक साधना है।

तकनीक ने दुनिया को हमारी मुट्ठी में समेट दिया है। आज सूचना, मनोरंजन और संवाद सब कुछ एक क्लिक की दूरी पर है। लेकिन इसी सुविधा के बीच इंसान अब धीरे-धीरे स्क्रीन का बंदी बनता जा रहा है। बच्चे से लेकर बुज़ुर्ग तक, हर कोई मोबाइल की रोशनी में खोया है। हर सुबह उठते ही मोबाइल की स्क्रीन देखना, दिन भर नोटिफ़िकेशन के पीछे भागना और रात को देर तक सोशल मीडिया में उलझे रहना, ये अब सामान्य आदतें बन चुकी हैं। इन आदतों ने हमारे नींद, स्वास्थ्य, रिश्तों और मन की शांति, अर्थात सब पर तो असर डाला है। कहने का सीधा सा मतलब यह है कि- डिजिटल युग में रहना कोई अपराध नहीं, लेकिन डिजिटल अनुशासन के बिना रहना ख़तरनाक ज़रूर है। इस लिहाज से डिजिटल अनुशासन इक्कीसवीं सदी का एक नया संस्कार है, जिसमें हम सबको दीक्षित होना बेहद ज़रूरी है। आज के युग की सबसे बड़ी परीक्षा यही है, क्या हम तकनीक के साथ अनुशासित रह सकते हैं ? अगर उत्तर हाँ है, तो निश्चय ही भविष्य अधिक उज्ज्वल, संतुलित और मानवीय होगा, इसमें कोई संदेह नहीं। इसके लिए ज़रूरत है- कुछ छोटे, लेकिन असरदार कदमों को उठाने की, मसलन सप्ताह का एक नो स्क्रीन ज़ोन तय करें, जहाँ मोबाइल, लैपटॉप और टीवी से दूरी रखी जाए। भोजन, बातचीत या पारिवारिक समय के दौरान मोबाइल को साइलेंट मोड में रखें। सुबह और रात के पहले घंटे को स्क्रीन-मुक्त रखें।।बच्चों के लिए स्क्रीन टाइम का स्पष्ट नियम बनाएं और खुद भी उसका पालन करें। और हाँ, सप्ताह में एक दिन डिजिटल उपवास रखें। तकनीक तभी वरदान है, जब वह हमारे नियंत्रण में रहे, अन्यथा वही जीवन की दिशा नियंत्रित करने लगती है। आज समय की सबसे बड़ी यही पुकार है- हम डिजिटल हों, पर साथ में अनुशासित डिजिटल नागरिक भी बनें, अन्यथा हँसी के नकली इमोजी के साथ चहरे के सन्नाटे के लिए तैयार रहो।  ऐसे में ज़िन्दगी सवाल तो करेगी, यह कैसा आधुनिक ठिकाना है…

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