ज्ञान चंद पाटनी (वरिष्ठ पत्रकार)

भारत में आवारा कुत्तों को सार्वजनिक स्थानों से हटाकर शेल्टर होम में रखने का निर्णय आज एक संवेदनशील और जटिल मुद्दा बन गया है, जिस पर देश भर में बहस चल रही है। हाल ही में सुप्रीम कोर्ट की तीन जजों की पीठ ने सरकारी और निजी अस्पतालों, शैक्षणिक संस्थानों और रेलवे स्टेशन जैसी सार्वजनिक जगहों से आवारा कुत्तों को हटाने के साथ उन्हें नसबंदी और टीकाकरण के बाद शेल्टर होम में रखने का निर्देश दिए गए हैं। इस फैसले के कई पक्ष हैं, जो आम जनता, स्थानीय निकायों, पशु अधिकार कार्यकर्ताओं और सरकारों से जुड़े हैं।

देश में आवारा कुत्तों से जुड़ी समस्याएं जैसे कुत्तों के हमले, रेबीज संक्रमण के बढ़ते मामले और हाईवे पर दुर्घटनाएं चिंता का विषय हैं। यही कारण है कि सुप्रीम कोर्ट को यह आदेश देना पड़ा। यह आदेश दर्शाता है कि सरकारें, पंचायती राज संस्थान और नगर निकाय आधिकारिक स्तर पर इस समस्या को ठीक से नहीं संभाल पा रहे हैं, जिससे हालत गंभीर हो गई है।

हालांकि पशु अधिकार कार्यकर्ता और कई एनजीओ इस आदेश का विरोध कर रहे हैं। उनका तर्क है कि आदेश मौजूदा एनिमल बर्थ कंट्रोल रूल 2003 के खिलाफ है, जिसमें कुत्तों को नसबंदी और टीकाकरण के बाद उनकी मूल जगह वापस छोड़ने को कहा गया है। शेल्टर होम में रखने से कुत्तों की दुर्दशा और मृत्यु दर बढ़ने का डर है। यह भी चिंता का विषय है कि देश में शेल्टर की संख्या पर्याप्त नहीं है। साथ ही जो हैं, उनका प्रबंधन भी लचर है।

भारत में एनिमल बर्थ कंट्रोल रूल के अनुसार शेल्टर होम ऐसी जगहों पर बनाए जा सकते हैं जहां कुत्तों को सुरक्षित और आरामदायक आवास मिले। शेल्टर को कंटीले तारों या चौड़ी दीवारों से घेरना, साफ-सफाई, पर्याप्त पानी, भोजन और चिकित्सा सुविधा देना आवश्यक माना गया है। इनके संचालन के लिए प्रशिक्षित पशु चिकित्सक और डॉग हैंडलर्स की नियुक्ति के साथ ​पिल्लों, बीमार और सामान्य कुत्तों के लिए अलग-अलग सेक्शन हों। नसबंदी व वैक्सीनेशन का रिकॉर्ड रखना भी अनिवार्य है। इसके अतिरिक्त, शेल्टर की नियमित समीक्षा और ऑडिट जरूरी है।

समस्या यह है कि भारत में शेल्टर होम की संख्या बेहद कम है और जो हैं उनके प्रबंधन पर भी सवाल उठते रहते हैं। जिस देश में निराश्रित गृहों और वृद्धाश्रमों में इंसानों के साथ अमानवीय व्यवहार के मामले सामने आते हैं, वहां शेल्टरों में बेजुमान कुत्तों को किस तरह रखा जाएगा, इसका अनुमान लगाना कठिन नहीं है। न्यायालय के आदेश से यह सवाल उपजा है कि क्या पर्याप्त संसाधन, स्थान और प्रशिक्षित स्टाफ उपलब्ध है, जिससे कुत्तों की उचित देखभाल हो सके।

इस निर्णायक वक्त में सरकारों, नगर निकायों और संबंधित एजेंसियों पर जिम्मेदारी आती है कि वे शेल्टर होम की संख्या बढ़ाएं, उनका प्रबंधन सुदृढ़ करें और पशु कल्याण संगठनों के साथ मिलकर कार्य करें। कुत्तों को केवल हटाना ही समस्या का हल नहीं है, बल्कि नसबंदी, टीकाकरण, जागरूकता अभियान और सामुदायिक भागीदारी से इस समस्या का समाधान निकाला जाना चाहिए।

सुप्रीम कोर्ट ने खास तौर पर सरकारी और सार्वजनिक स्थलों पर ही कुत्तों को हटाने का निर्देश दिया है। दरअसल, कोर्ट का फोकस उन संवेदनशील और व्यस्त स्थानों की सुरक्षा पर है। गली—मोहल्लों में घूम रहे कुत्तों को शेल्टरों में नहीं डाला जा रहा। कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि लोगों की सुरक्षा सर्वोपरि है। साथ ही, सरकारी एजेंसियों को आदेश दिया गया है कि वे हेल्पलाइन स्थापित करें, शिकायत मिलने पर तुरंत कार्रवाई करें और शेल्टर होम का प्रभावी संचालन तथा निगरानी सुनिश्चित करें।

आवारा कुत्तों को शेल्टर होम में रखने का निर्णय सार्वजनिक सुरक्षा और पशु संरक्षण के बीच संतुलन साधने का प्रयास है। यह जरूरी है कि इसे क्रियान्वित करते समय संवेदनशील दृष्टिकोण को बनाए रखा जाए और स्थानीय परिस्थितियों के अनुरूप रणनीतियां अपनाई जाएं। तभी भारत में आवारा कुत्तों का प्रबंधन प्रभावी और संवेदनशील तरीके से हो सकेगा।

दूसरी ओर, सार्वजनिक स्थानों जैसे अस्पताल, रेलवे स्टेशन, बस अड्डे और शैक्षणिक संस्थान, जो संवेदनशील और व्यस्त स्थान हैं, वहां कुत्तों की उपस्थिति से सुरक्षा और स्वच्छता की गंभीर समस्या होती है। अस्पतालों में नवजात शिशुओं को कुत्तो ने नुकसान पहुंचाया, ऐसे मामले भी सामने आए हैं। इसलिए, स्थिति की गंभीरता को देखते हुए, ऐसे स्थानों से कुत्तों को हटाना आवश्यक है, परंतु उनकी रक्षा के लिए उचित शेल्टर होम उपलब्ध कराना भी जरूरी है।

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