निठारी कांड ने भारत की आपराधिक जांच-पड़ताल की मौजूदा व्यवस्था को भी आईना दिखा दिया
अभिमत
निठारी हत्याकांड ने न केवल समाज को दहलाया, बल्कि देश की आपराधिक जांच प्रणाली की कमजोरियों को भी उजागर कर दिया। सुप्रीम कोर्ट और इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसलों के मुताबिक, जांच एजेंसियों की गंभीर लापरवाही, देरी और फॉरेंसिक प्रक्रियाओं में गड़बड़ियां अपराधी तक पहुंचने में सबसे बड़ी बाधा बनीं। यह वाकई हैरत की बात है।
इस केस में सबसे बड़ी समस्या सबूतों की चेन के सही तौर पर संरक्षित न होने की रही। मौके से बरामद मानव अवशेष, कपड़े और अन्य वस्तुएं वैज्ञानिक तरीके से सील नहीं की गईं। फॉरेंसिक नमूनों के संग्रह में गंभीर लापरवाही बरती गई। इस वजह से साक्ष्यों पर सवाल उठे। फॉरेंसिक रिपोर्ट ही निर्णायक साक्ष्य हो सकती थी, लेकिन जांच में खामियां थीं जिससे यह संदिग्ध रही। सुरिंदर कोली की गिरफ्तारी के समय किसी स्वतंत्र गवाह को पेश नहीं किया गया। पुलिस हिरासत में कोली ने जो कबूलनामा किया, वह अदालत ने भरोसेमंद नहीं माना।

पूरे प्रकरण में जांच एजेंसियों पर देरी व पेशेवर क्षमता के अभाव का भी आरोप लगा। लंबे समय तक लापता हुए बच्चों के परिवारों ने थानों के चक्कर काटे, लेकिन पुलिस ने उनकी शिकायतों को पर्याप्त गंभीरता से नहीं लिया। जब घटनास्थल से हड्डियां बरामद हुईं, तब जाकर पुलिस सक्रिय हुई।
अदालतों ने बार-बार कहा कि अभियोजन पक्ष ने समय-समय पर रुख बदला। जिन साक्ष्यों और कबूलनामों पर पूरा केस टिका रहा, उनकी कानूनी मजबूती संदिग्ध थी। पुलिस और सीबीआई द्वारा प्रस्तुत साक्ष्यों, गवाहों के बयानों और फॉरेंसिक रिपोर्ट की कड़ी आपस में नहीं जुड़ी। नतीजतन, इतने वर्षों बाद भी असली अपराधी की पहचान नहीं हो पाई।
इस प्रकार, निठारी कांड ने भारत की आपराधिक जांच-पड़ताल की मौजूदा व्यवस्था को भी आईना दिखा दिया। यदि जांच में शुरू से ही प्रोटोकॉल, फॉरेंसिक सतर्कता और मानवीय संवेदना का पालन हुआ होता, तो शायद आज पीड़ित परिवारों को यह सवाल नहीं पूछना पड़ता—” हमारे बच्चों की हत्या आखिर किसने की?”
